बातें
कल रात की बात है.रोज की तरह टेबल लेम्प बुझा कर लिहाफ में दुबक कर नींद लगने का रास्ता देख रहा था.आँखे बंद कर ली थीं .
मगर नींद आने कि जगह,बंद आँखों के दृष्टि पटल पर चहरे उभरने लगे.तुम्हारा चेहरा,उस-का,और मेरा भी.....फिर चल पड़ा बातों का सिलसिला.
बात निकली तो गयी भी बहुत दूर तलक.तुम्हारी बात,उसकी बात,मेरी बात दुनिया जहान के सुख दुःख की बातें.काम की बातें बेकाम की बातें, मुस्कुराने की बातें, लतीफे,ठहाके,सभी कुछ.
पता नहीं कितनी देर तक चलता रहा यह सब.पता नहीं कब बातों का सिल्सिला रुका और कब नींद आ गयी.
सुबह उठा तो कागज कलम का इंतज़ाम कर लिखना शुरू किया है.तय हुआ था कल रात की हर सुबह रात की बातों को कागज पर उतारा जाए.
हफ्ते भर बाद जो लिखा उसे पढ़ा जाए और अगर इस सब का कुछ बनाता है,तो सिलसिला जारी रहे वरना रात गयी बात गयी.
ठीक है न.कभी तुम्हारी बात होगी और सब सुनेंगे.कभी उसकी बात होगी और हम सुनेंगे .कभी दुनिया बोलेगी और हम सुनेंगे. हाँ कभी मैं बात बरूंगा और सिर्फ तुम समझोगी.
बस आज इतना ही.
मंगलवार, 8 दिसम्बर 2009
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