बातों का मज़ा तभी है जब बात से बात निकलती रहे. बतरस कर्णप्रिय हो और कान से उतर कर कहीं दिल को छू भी जाए.
दिल को वही बात छूती है जिस में कहीं न कहीं "उस" का जिक्र हो. जैसे कि सूफियों का कलाम."वह" जिस किसी भी संत फ़कीर, सूफी ,सांई, या गुरु की वाणी में हो, सुनने वालों को अपनी ओर आकर्षित करता ही है."वह" किसी को अपने माशूक के रूप में दिखता है,किसी को साहिब के रूप में दिखता है,किसी को माँ के रूप में ,किसी को आदिशक्ति के रूप में तो किसी को राम,कृष्ण,या शिव के रूप में. कोई "उसे" परम पिता मानता है और कोई "उसे" बालकृष्ण मानता है. निर्गुण,निराकार परब्रह्म भी "वही" है.
जब भी, जहाँ भी कोई रामकथा या भागवत कथा कहता है श्रोता वहीं खिंचे पहुँचते हैं.सुना, पढ़ा तो यह भी है कि जब गोस्वामी तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पर रामकथा सुनाया करते थे तो स्वयं पवनपुत्र हनुमानजी श्रोताओं में बैठकर रामकथामृत का पान किया करते थे .
तब से लेकर अब तक श्रोता हर उस माध्यम की ओर आकर्षित होते हैं जिस में "उस" की बात हो.
दूरदर्शन पर जब सुबह रामायण धारावाहिक प्रसारित होता था रविवार की सुबह तो हर शहर में सड़कें ,बाजार सब सूने हो जाते थे और जिसे जहाँ जगह मिलती थी,अपने घर,पड़ोसी के घर,या दूकान में बुद्धू बक्से के सामने जम जाता था .उस दिन काम काज ९ कि बजाय ११ बजे शुरू होते थे.ऐसी और इतनी लोकप्रियता किसी अन्य कार्यक्रम को मिली है?आज भी सभी चैनल किसी न किसी रूप में "उस" की बात वाले कार्यक्रम दिखाते रहते हैं.
"उस ही की जय हो!!"
आज इतना ही.
शुक्रवार, 11 दिसम्बर 2009
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